भारत में हर 100 किलोमीटर पर भाषा बदल जाती है, लेकिन आज के डिजिटल और शहरीकरण के दौर में कई स्थानीय बोलियाँ (डायलेक्ट्स) खत्म होने की कगार पर हैं। हम सब हिंदी, अंग्रेजी, और दूसरी मेनस्ट्रीम भाषाएं तो बोलते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी दादी-नानी की ज़ुबान आजकल सुनाई क्यों नहीं देती?
📉 क्यों खतरे में हैं स्थानीय बोलियाँ?
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शहरीकरण और शिक्षा प्रणाली:
आज की शिक्षा व्यवस्था में मातृभाषा या बोली को प्राथमिकता नहीं दी जाती। बच्चे हिंदी या अंग्रेज़ी बोलना सीखते हैं, लेकिन अपनी जड़ों से दूर हो जाते हैं। -
सोशल मीडिया और डिजिटल युग:
इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक पर दिखने वाली भाषा मेनस्ट्रीम होती है। गुज्जर, भील, मारवाड़ी, बुंदेली, मैथिली जैसी बोलियाँ यहाँ गायब हैं। -
पीढ़ियों में अंतर:
नई पीढ़ी को अपनी बोली से गर्व नहीं, बल्कि शर्म आती है। यह मानसिकता बोलियों के लुप्त होने का सबसे बड़ा कारण है।
🌾 बोली सिर्फ भाषा नहीं, संस्कृति है
हर बोली के साथ एक लोककथा, एक त्योहार, एक लोकगीत, और एक आस्था जुड़ी होती है। जब कोई बोली मरती है, तो उसके साथ पूरा सांस्कृतिक खजाना भी खत्म हो जाता है।
🛑 क्या हो सकता है समाधान?
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स्कूलों में बोली आधारित शिक्षण:
कम से कम प्राइमरी स्तर पर बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाया जाए। -
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बोली का इस्तेमाल:
यूट्यूब, ब्लॉग्स, और सोशल मीडिया पर अपनी बोली में कंटेंट बनाइए। -
बुजुर्गों से संवाद:
घर में दादी-नानी से उनकी बोली में बात करिए। यही असली विरासत है।
📢 निष्कर्ष:
भाषा सिर्फ बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान का हिस्सा होती है। अगर हम अपनी स्थानीय बोलियों को नहीं बचाएंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ किताबों में ही उनकी झलक मिलेगी।
आज ही सोचिए – आपने आखिरी बार अपनी बोली में कब बात की थी?


Ye to hai
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